तेरी रातें बता देंगी तुझे
तेरी रातें बता देंगी तुझे ए मुसाफ़िर की स़हर तेरा अभी कितनी दूरी में है
अपनी राहों से पूछ लेना मंजिल अपनी, की बसर भी अभी मजबूरी में है,
अभी तो रातें तेरी बीती हैं महज़ जागने और सोने की ही इक रंजिश में
नादान से अरमां तेरे जले ही कहां हैं अभी धूप और दर्द की तपिश में,
दर्द अभी थोड़े मिले ही थे तुझे की दिल को तुमने दर्द का आशियां समझ लिया,
थोड़े से ही ज़ख्मों की सौगात में तुमने ज़िंदगी को ज़ख्मों का कारवां समझ लिया,
अभी तो शुरू हुआ है ज़ख्मों का दौर ,रूह तक ख़ूं से रंग जाएगी ऐसे भी कुछ खंजर चुभेंगे,
सब्र रखना ज़रा, खुद के जिस्म में जान तेरी बेमौत मर जाएगी ऐसे भी ज़िंदगी में मंज़र आएंगे।
By : Sujata Kumari
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