जश्न-ए-आजादी महज़ इक रीत बनके रह गई
जश्न-ए-आजादी महज़ इक रीत बनके रह गई
देशभक्ति महज़ जवानों की प्रीत बनके रह गई,
तिरंगे की ऊंचाई इक झंडा फहराने तक ही है क्या,
रंगों का गौरव तिरंगे के महज़ लहराने तक ही है क्या?
केसरिया ख़ून से रंगा वो इतिहास बताने में चूक गया क्या,
रंग हरा हरियाली से अब नाता सदा के लिए तोड़ गया क्या?
श्वेत सच्चाई के मर्म को समझाने में सफल अब होता क्यों नहीं,
चक्र अब प्रगृती में नर-नारी की समान भूमिका बताता क्यों नहीं?
परिंदे भी आजाद हैं यहां आसमां देखो खुला है उनका भी
बेटियों के हक में भी आसमां लिखो जोड़ने दो उन्हें तिनका भी,
कब तक तेजाब ,नकाब और जिस्म की बेड़ियों में कैद भारत रहेगा,
जिम्मेदारी , नाकामयाबी की बेड़ियां तोड़ कब देश का युवा निकलेगा?
रानी वो झांसी की नारियों को अबला बनना सीखा गई थी क्या,
तलवारबाजी पे हक़ है सिर्फ मर्दों का ये कहानी बता गई थी क्या?
मूंछों पे ताव देके मां भारती का लाल जो शहीद हुआ देश की आबरू और आन पे,
पुरुषत्व का अर्थ हैवानियत में बदलकर दाग़ लगाते हो क्यों ऐसे महापुरुषों की शान पे?
भारत का गौरवशाली इतिहास हम सब को पन्नों से उठाकर जीवन में ढालना है
कर्तव्य और अधिकार में सामंजस्य बैठाकर हिंदुस्तान को अब हमें संभालना है।
बारिश का इंतज़ार
बारिश का इंतज़ार मेरी सुनी अंखियों में
तरसी तुझ बिन मैं सोयी जागी रतियों में,
धरा ये बिन बारिश सावन में तरसती है ऐसे
तुझ बिन विरह अगन नैनों से बरसती है जैसे,
जल-जलकर राख हुई शम्मा तेरी सावन में
मेरे घर को छोड़ जैसे बरसी बूंदें हर आंगन में,
इक तेरी आस में बुझते दिए पल-पल जलाए
तू आएगा अबकी सावन बैठी हूं मैं नैन बिछाए,
छवि देख तेरी बूंदों में कभी मुस्काती जाऊं
कभी तेरी यादों में हर पल मैं नीर बहाऊं,
तेरी यादों की तरह जब हथेली में मेरी ठहर जाती है
सावन की वो बूंद आख़िरी नमी आंखो में ले आती है।
********
शिव-शक्ति
कण-कण में विराजित है तू
तुझमे समाहित कण-कण मेरा,
तप मेरा तू ,व्रत भी पिया तुमसे है
तुझको अर्पित है ये जीवन मेरा,
वैरागी तेरा जोग ते कैसा
महलों की रानी जोगन हुई
प्रीत चुनरिया ओढ़ के देखो
मैं तेरी अमर सुहागन हुई।
बात जो तेरी मर्यादा पे आए
शती बन अग्नि में जल जाऊं
बनके पार्वती भी मिलूंगी तुमसे
शक्ति हूं हर जनम शिव में ही समाऊं,
धरती को स्वीकार करो है अंबर
प्रेम का आज नया आधार रखो
हे शिव तुझे अर्धांग मैंने मान लिया
अर्धांगिनी अब मुझको स्वीकार करो।
**********
मिलन
मिलन तुम्हारा और मेरा है या मिलन आज अमर प्रीत का है
जग से जीते हम या जीत गया प्रेम किस्सा किसकी जीत का है,
ये महकी फिजाएं प्रेम से सजे है नज़ारें कली कली झूम रही हैं
प्रेम - रागिनी में बहती ये हवाएं आज आसमां को चूम रही है,
अमर मिलन पिया हमारा प्रेम की अमर कथा कोई रच रहा है
मिलन ये आज हमारा प्रेम ग्रंथ के पन्नों में नई गाथा लिख रहा है,
हमारे मिलन में सम्मिलित है प्रकृति ऐसे जैसे मिले हो आज राधा और श्याम
आज धरती - अंबर सजे हैं ऐसे प्रेम रंगों में जैसे मिले हो आज वैदेही को राम।
©Sujata Kumari
Hope u like it ☺️☺️
0 Comments