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रक्षाबंधन ( संस्मरण ) -- सुनीता जौहरी

विधा -संस्मरण 
"वो....रक्षाबंधन"

आज हम सब बड़े हो गए हैं ।सब अपने -अपने परिवार के साथ व्यस्त हो गए हैं।कोई विदेश में बस गया है तो कोई अपना -अपना मकान बनवा कर अलग रहने लगा है ।

हम संयुक्त परिवार में रहते थे ।हमारे बहुत सारे भाई बहन हैं। हम सब मिलकर कुल 16 भाई बहन है। बचपन में हमारी दादी सबको नीचे जमीन पर बैठाती थी । बिल्कुल पंगत की तरह।हम सब हंसी -खुशी  इकट्ठे होकर सब को राखियां बांधती थी ।

फिर मम्मी अपने मायके व चाची लोग अपने अपने मायके जाती थी ।बुआ लोग भी आती थी पापा वह चाचाओं को राखी बांधने। हम सब इकट्ठे होकर हंसी खुशी इस त्यौहार को मनाया करते थे।
 मम्मी के साथ नानी के यहां जाने का भी उत्साह होता था। नानी के यहां मम्मी अपनी सहेलियों से भी मिलती थी ,उनका हालचाल पूछती थी ।सब अपने -अपने मायके आती थी ,और इकट्ठा होती थी ।
सब ऐसे जल्दी-जल्दी से बात करती थी कि कितना बात आज ही खत्म कर ले ।और सही भी था ।
फिर तो एक साल बाद ही मम्मी अपनी सहेलियों से मिल पाती ।उस समय मोबाइल फोन तो था  नहीं सो सब रक्षाबंधन पर ही आती थी ।और अपने भाइयों को राखी बांधने के बाद इकट्ठे होकर बात किया करती थी ।
धीरे-धीरे सभी अपने अपने-अपने परिवार में व्यस्त हो गई ।अब किसी के पास इतना समय ही नहीं है। पहले की तरह मिलजुल कर हंसी -मजाक करना ।अब लोगों को समय बर्बाद करना लगने लगा है ।
सचमुच वो भी क्या दिन थे। इतना उत्साह , इतना उमंग सब के साथ घुल-मिल जाना उत्साह, उमंग के साथ सचमुच त्यौहार मनाना।।
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 सुनीता जौहरी ( Co-Founder , IconicQuote )
वाराणसी उत्तर प्रदेश
स्वरचित व मौलिक

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