Welcome to IconicQuote. Search your name by Alphabet. Open your page via Url. Read your favorite writer's Quote.

Search your name

कविताएं (Volume 2) - Mohan Lal Arora


⋇⋆✦⋆⋇ रचना ⋇⋆✦⋆⋇

🌹 सनातन धर्म 🌹 

हम गीता पढ़ने वाले 
हम रामायण के गायक हैं 
श्री राम प्रभु के वंशज हम 
केशव से आपने नायक हैं 
पुरे जग को अपना कहते
हम सबको अपनाने वाले
हम सनातन धर्म के पोषक है 
त्याग और क्षमादान करने वाले
हम असूरो के संहारक है 
हम दुश्मन दल के काल बने
माँ दुर्गा और माँ पार्वती 
माँ काली सम विकराल बने
हम शरणागत के रक्षक है 
दुश्मन के लिए सायक है 
श्री राम प्रभु के वंशज हम 
केशव से अपने नायक है 

डाँ मोहन लाल अरोड़ा 
ऐलनाबाद सिरसा


💐 ऐ दर्द 💐  

ऐ दर्द मै था जितनी दुर तुझसे 
बेइन्तहाँ नफरत भी थी तुझसे
पर आज तू मेरा सच्चा मित्र है 
मेरे सफर का हमराही है तु
जब कोई नही समझता मेरी दास्ताँ
पर तू सब कुछ पढ़ लेता है 
सपने में भी नहीं सोचा कभी
तू मेरे इतने करीब आ पाएगा
यूँ तेरा मेरा नाता गहरा जाएगा 
भागता था हमेशा तेरे साये से दुर
पर आज तेरे साथ हूँ जीने को मजबूर 
हुई तुझसे यारी सब छोड़ गये साथ
पर तुमने अभी भी थाम रखा है मेरा हाथ
ना कोई उम्मीद ना कोई आस है 
ना अब मुझे कोई खुशी की तलाश है 
ऐ दर्द तुझसे नाता होते ही 
छोड़ा मुझे अपनो ने अधर मे
ढूँढ रहा हूँ अब मै रिस्तो के मायने 
उलझा हूँ अभी भी कैसे कैसे भँवर में 
ना कोई साथी ना अब सिर पर किसी का हाथ
ऐ दर्द अब तू भी मत छोड़ना मेरा साथ 
ऐ दर्द अब तु भी मत छोड़ना मोहन का साथ 

डाँ मोहन लाल अरोड़ा 
ऐलनाबाद सिरसा


💐 इंतजार 💐 

आज भी इंतजार बाकी है 
उनसे क़रार होना बाकी है 
हसरत-ऐ-दिल निकल लो आकर 
अब भी फस़्ल-ऐ-बहार बाकी है 
यह दिखावे के नाज नखरे हैं 
तेरी आँखों में प्यार बाकी है 
डगमगाते क़दम है यूँ मेरे
उस ऩजर का खुमार बाकी है 
हर भ्रम टुटता गया बस
इक तेरा ऐतबार बाकी है 
मौत आवाज मत लगा मुझ पर 
जिंदगी का उधार बाकी है 
मीरो-गालिब जिगर की सफहो में 
मेरा होना शुमार बाकी है 
तेरी ख़ातिर दुआऐ करने को
अब भी यह ख़ाकसार बाकी है 
यह भी कुछ कम नहीं मेरे "मोहन"
कोई तो गुनगुसार बाकी है 

डाँ मोहन लाल अरोड़ा
29,, कविता,,, 

💐फिर से लिख रहा हूँ 💐 

मै वही इतिहास फिर से लिख रहा हूँ 
बंद कर परिहास फिर से लिख रहा हूँ 
बन रहे थे जो अब तक धुर विरोधी 
हो गए हैं अब खास फिर से लिख रहा हूँ 
चंद दिन पहले ही बनी थी यह सड़क तो
जम गई है घास फिर से लिख रहा हूँ 
बात जो तुम कर रहे हो इस तरह से 
आ रही ना रास फिर से लिख रहा हूँ 
सीढियाँ हर दिन युवा गर चढ रहे है 
इतनी क्यो भड़ास फिर से लिख रहा हूँ 
न्याय का यह खेल अब तो सालता है 
मत करो दुहाई फिर से लिख रहा हूँ 
यह सियासत चाहता है मोहरा बस
क्यो लड़ा चुनाव फिर से लिख रहा हूँ 
बढ रही जो दुरिया सब के दिलो में 
छू रही आकाश फिर से लिख रहा हूँ 
किस तरह इंसान "मोहन" जी सकेगा 
चुभ रहा आभास फिर से लिख रहा हूँ 

डाँ मोहन लाल अरोड़ा 
ऐलनाबाद सिरसा 
9896853750 

💐 आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए 💐 

आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए 
अपनी और अपने देश की प्रगति बढाये
बढती ठगी और लालच को दुर भगाये
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाए
बुरे कामो और झुठ पर लगाम लगाये
आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए 

 सब मिल कर अच्छे संस्कार अपनाऐ
माता पिता और गुरू का सम्मान बढाये 
आध्यात्मिक और आर्थिक शिक्षा बढाये
शुद्ध और नेक मानसिकता बनाए
आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए 

सुख शान्ति और वफादारी निभाए
दुख दर्द और द्बेष को दुर भगाए
प्यार और मित्रता का संग बनाए 
खुशी और उल्लास का माहौल बनाऐ
आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए 

झुठी शान और दिखावा दूर भगाऐ
बढते अपराध और पाप को ख़त्म कराये
गरीबी दरिद्रता और बिमारी का इलाज कराये
माताओ बहनो और बेटियों का मान बढाये
आओ सब मिल कर ईमानदारी अपनाए

डाँ मोहन लाल अरोड़ा 
9896853750


🌹 दर्द-ऐ-तन्हाई 🌹 

उस से क्यूँ रहा नही गया
मुझ से #दर्द सहा नही गया 

दुर तक यह #तन्हाईयोँ का सिलसिला दिया
दायरे इनकार के,,, इकरार की सरगोशियाँ
दिल से भूला देने का मुझे ना कोई #गिला दिया

दर्द-ऐ-तन्हाई की सारी तहे और हादसे गुजार दिये
सब हो गये धुँआ एक एक वाकिया #विसार दिये

#लज्जत-ऐ-वस्ल से भी बढ कर है मजा
इक सफीना सा है तेरी तन्हाई की सजा

दिल में छिपे हसरतों के #मयखाने सजते रहे
हिचँकिया रात भर #दर्द-ऐ-तन्हाई बजते रहे 

उस से क्यूँ रहा नही गया 
मुझ से #दर्द सहा नहीं गया 

डाँ मोहन लाल अरोड़ा 
ऐलनाबाद सिरसा
26-10-2020
9896853750


🌹 ले चल रे मेरे गाँव 🌹 

ले चल रे मेरे गाँव, जहाँ थी बरगद की छाँव 
मिलजुल कर जहाँ रहते थे लोग
प्यार और मिलन के थे अजब संजोग 
ना कोई झगड़ा ना कोई रौला
थे सब अपने अपने काम में हरफनमौला 
खुली गली बड़ा दालान शुद्ध था वातावरण 
तनिक ना था हवाओ में प्रदुषण 
स्वच्छ पवन ताजा सुमन करते थे अभिवादन 
ले चल रे मेरे गाँव जहाँ थी बरगद की छाँव 
लुका छिपी, पोषण पा और बनती थी रेल
गिली डंडा ,खो खो जैसे थे निराले खेल 
उदीप्त जहाँ होते थे दिलो के मेल
ले चल रे मेरे गाँव जहाँ थी बरगद की छाँव

डाँ मोहन लाल अरोड़ा
********


©Mohan Lal Arora

****************

Please read my quotes by....

Searching my name in search bar or
Searching in Alphabet seaction "M"
Clicking on the tag of my name

You can bookmark this page in your browser to open my page directly.

Please share my quote to your friends by...
Clicking on the Share buttons given below.

Please give your feedback in Comment section.

Thanks.... 😊😊


**Tell about IconicQuote or
**Share the link  with your friends to join IconicQuote

Post a Comment

0 Comments

Thanks for visiting to IconicQuote.Search your name by Alphabet.Open your page via Url.Read your favorite writer's Quote.