" पुरुष धर्म है ,अर्थ है, काम है ,मोक्ष है
पुरुष अपने आप में पूर्णता पुरुषार्थ है"
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"पुरुष पुरुषार्थ के पहले अंग धर्म की
भागीदारी भी पूर्णतया निभाता है"
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मां का है वह साया बनता
बहन का रक्षक बनता है
पत्नी का पुरुषोत्तम है बनता
बेटी के लिए योद्धा बन धर्म निभाता है
मंदिर चाहे कभी जाए ना जाए
घर का हर धर्म बखूबी निभाता है
मां की दवा बहन की पढ़ाई
पत्नी का श्रृंगार ,बच्चों की इच्छा
पूरी करने का धर्म पुरुष निभाता है
हां पुरुष पुरुषार्थ का पहला
प्रकार पूर्णता धर्म कहलाता है
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"पुरुष पुरुषार्थ दूसरे अंग अर्थ की
भागीदारी भी पूर्णतया निभाता है"
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पुरुष अपने नाम के अर्थ के समान
अपने आप में विशेष अर्थ रखता है
पुरुष अपने नाम के अर्थ के अनुसार
घर का वीर योद्धा कहा जा सकता है
पुरुष अपनी परेशानियों को छिपाकर
हमेशा खुश होने की कोशिश करता है
पुरुष घर की नींव और छत है अपने
आप में एक महान अर्थ में निपुण है
मंजिलों टीके घर की नींव एक पुरुष है
टपकती छत की मरम्मत भी एक पुरुष है
घर में किसी बच्चे के अवतरण की जिम्मेदारी
को उम्र भर संभालने के अर्थ में एक पुरुष है
घर में मृत्यु पर्यंत कंधा देने वाला भी पुरुष है
सच में पुरुष अपने अर्थ के समान विशेष वाला है
समाज नामी ग्रंथ में पुरुष अर्थ है वाक्य है सारांश है
समाज की जड़ है समाज के ललाट का चंदन है
"पुरुष अपने नाम के अर्थ के अनुसार इस
संसार में सच में पुरुषार्थ के अर्थ के समान है"
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पुरुष पुरुषार्थ के तीसरे अंग काम की
भागीदारी भी पूर्णतया निभाता है"
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केवल महिलाएं ही नहीं पुरुष भी
सूरज के साथ-साथ उठ जाता है
कोई मजदुरी कोई छोटा ,बड़ा व्यापार
तो कोई नौकरी करने निकल जाता है
अपनी शारीरिक पीड़ा को नजरअंदाज
कर अपने कार्य में न्योछावर हो जाता है
पांव में छाले या हो सर में दर्द चाहे हो तपता
बुखार से बदन फिर भी काम को महत्व देता है
"सिर्फ अपने परिवार और अपनों के खातिर
एक पुरुष कार्य में इतना लीन हो जाता है"
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"पुरुष पुरुषार्थ के चौथे अंग मोक्ष की
भागीदारी भी पूर्णतया निभाता है"
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एक पुरुष जब एक बच्चा होता है तभी से
वह मोक्ष को भलीभांति जान जाता है
एक पुरुष त्याग करता है अपनी इच्छाएँ
और इच्छाओं को मोक्ष प्राप्ति दे देता है
घर की जिम्मेदारियों को संभालते संभालते
पुरुष अपनी इच्छाओं को मारकर मोक्ष दे देता है
जिम्मेदारी एक पुरुष को इतना बदल देती है
की पुरुष अपनी मन के भावों का स्वाहा करता है
पुरुष एक छोटी उम्र में ही अपने मन की लालसा ख्वाहिशें सपने सबको मोक्ष दे देता हैं। सिर्फ अपनों की खुशी के लिए अपनों का भविष्य सुंदर बनाने के लिए निरंतर एक नदी की तरह रहता हैं। खुद को भूल कर अपनों के लिए जीने लगता हैं। हर त्योहार पर खुद के लिए कपड़े आए या ना आए घर के हर एक सदस्य के लिए कुछ ना कुछ आना जरूरी होता है चाहे कोई त्यौहार पर को छुट्टी ना मिले पर घर पर मिठाई तोफे सही समय पर पहुंचाना वह अपनी खुशी मांन लेता हैं।
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"एक पुरुष एक परिवार के लिए वह जड़ वाला वृक्ष है जो छाया फल ऑक्सीजन इंधन सब भरपूर मात्रा मैं देता है और खुद बिना थके शांत खड़ा रहता है"
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©MONIKA PUROHIT

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