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देते रहे ज़ख्म -- Usha Shrivas

 देते रहे ज़ख्म बड़े शौक से वो हमें 

हमदर्दी पाने की चाहत में, गैरों से

हाल-ए-दिल कभी सुनाया ही नहीं


दम घुटती रही स्याह रातों में मेरी,

च़रागों की चाहत से,आशियाने में

हमने दीया कभी जलाया ही नहीं


बिकती रही बदनामियाँ अखबारों में,

बेगुनाही के सबूत दफ्न कर उनके...

कोई राज हमने कभी छिपाया ही नहीं


छलकती रही अश़्क पैमाने से मेरी..

भरी महफिल में उन्हें बेवफा ठहराने

जाम होठों से कभी लगाया ही नहीं..


सजा-ए-मौत भी मिली मोहब्बत में हमें

तरस खाने को दो पल साँसों पर मेरी..

हमने फिर कभी, सिर झुकाया ही नहीं


तुम्हारे दिये हर इक ज़ख्म का हिसाब

अब भी बाकी है जाना..देखो आज भी

इस पर मरहम हमने लगाया ही नहीं....


© Usha Shrivas

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